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जगन्नाथ पुरी श्रृंखला – भाग १ पुरी: जहाँ ईश्वर खुद सड़कों पर उतरते हैं।

Updated: Jul 14, 2025

आइए श्रृंखला का पहला भाग प्रस्तुत करते हैं: जगन्नाथ पुरी


(My-Lekh द्वारा एक विशेष श्रृंखला)


“जब भगवान अपने रथ पर सवार होकर भक्तों के बीच आते हैं, तब वह सिर्फ उत्सव नहीं होता — वह एक दिव्य मिलन होता है।”

भारत के पूर्वी तट पर, समुद्र की लहरों से खेलता एक पवित्र नगर — पुरी। यह कोई साधारण तीर्थ नहीं, यह वह भूमि है जहाँ ईश्वर खुद अपने भक्तों से मिलने आते हैं। और जब वे आते हैं, तो कोई बड़ा-छोटा नहीं रहता, न ब्राह्मण, न शूद्र। न स्त्री, न पुरुष। सब सिर्फ एक पहचान रखते हैं — “भक्त” की।


पुरी में हर वर्ष आयोजित होने वाली रथ यात्रा महज एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आस्था की पराकाष्ठा है। यह उस समय की याद दिलाती है जब भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ गुंडिचा मंदिर में विश्राम के लिए जाते हैं — और इस यात्रा में वो नहीं, बल्कि लाखों भक्त उनके रथ को खींचते हैं।

रथ यात्रा की शुरुआत: एक परंपरा नहीं, एक दिव्य कथा

भगवान जगन्नाथ को लेकर एक मान्यता है कि वे भगवान विष्णु का “पाटीट भाव” यानी जन-जन का रूप हैं। उनके रथ में कोई जात-पात नहीं, कोई भेदभाव नहीं। रथ खींचने वाला गरीब हो या राजा, सब बराबर हैं।

जब रथ यात्रा शुरू होती है, तब पुरी का पूरा वातावरण दिव्यता से भर जाता है। मंदिर के सिंहद्वार से विशाल रथ निकलते हैं — नक्काशीदार लकड़ी के तीन भव्य रथ —

  • नंदीघोष (जगन्नाथ का रथ)

  • तालध्वज (बलभद्र का रथ)

  • दर्पदलन (सुभद्रा का रथ)

इन रथों को खींचने के लिए लाखों हाथ आगे आते हैं। माना जाता है कि रथ की रस्सी पकड़ने मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

जब ईश्वर राजमहल छोड़ते हैं

रथ यात्रा में एक सबसे भावुक क्षण होता है — जब भगवान जगन्नाथ अपने गर्भगृह से बाहर आते हैं। इसे “पाहंडी यात्रा” कहा जाता है। भक्तों के आंखों में आँसू और जुबां पर "जय जगन्नाथ!" के नारे होते हैं।

यह वह पल है जब ईश्वर का भव्य रूप, राजा की तरह सजे हुए, भक्तों के बीच उतरता है। यह दृश्य देखने लाखों श्रद्धालु आते हैं, और टीवी-इंटरनेट पर करोड़ों लोग जुड़ते हैं।

गुंडिचा मंदिर: माँ का घर, और विश्राम की जगह

भगवान जगन्नाथ की यह यात्रा उनके मौसी (माँ की बहन) के घर तक होती है — गुंडिचा मंदिर, जहाँ वे नौ दिन रहते हैं। यह स्थान शुद्ध प्रेम का प्रतीक है — जहाँ कोई मांग नहीं, कोई याचना नहीं। बस सेवा है, आत्मीयता है।

भक्त इन नौ दिनों में भगवान के दर्शन करके अपने जीवन को धन्य मानते हैं।

रथ यात्रा का अंत नहीं, एक नई शुरुआत

नौ दिनों के बाद भगवान अपने घर लौटते हैं — जिसे "बहुड़ा यात्रा" कहा जाता है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में जो सबसे अद्भुत बात होती है, वो है भक्ति का विशाल समर्पण।लोग भोजन नहीं करते जब तक रथ के दर्शन ना हो जाएं।कुछ श्रद्धालु तो रथ खींचते हुए गिर पड़ते हैं, और उनकी यही मृत्यु कहलाती है “मोक्ष”।


एक अनुभव, जो शब्दों से परे है

जो भी एक बार रथ यात्रा देखता है, उसकी आंखों में श्रद्धा का समंदर और हृदय में शांति का आकाश उतर आता है।

यह कोई यात्रा नहीं — यह जीवन का तीर्थ है, जहाँ ईश्वर किसी सिंहासन पर नहीं, बल्कि रस्सी से बंधे रथ पर होते हैं — और भक्त उनके सारथी।

जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सर्वधर्म समभाव और मानवीय एकता की जीवंत मिसाल भी है।


🙏 भावनाओं से भरी कुछ सच्ची कहानियाँ और घटनाएँ


💚 1. सालबेग की कहानी – एक मुस्लिम भक्त, जिसकी खातिर आज भी हर वर्ष कुछ समय के लिए उनकी दरगाह के सामने रथ रुकता है।


पुरी की रथ यात्रा हर साल जब निकलती है, तो रथ कुछ क्षणों के लिए एक दरगाह के सामने रुकता है। ये कोई व्यवस्था नहीं — ये ईश्वर की मर्यादा है, जो वह अपने उस भक्त के लिए निभाते हैं, जो जन्म से मुस्लिम था, पर आत्मा से श्रीजगन्नाथ का परम भक्त।

इस भक्त का नाम था सालबेग।


वह मुग़ल सेनापति का पुत्र था, पर एक दिन जब उसकी माँ बीमार हुई और कोई मदद न मिली, तो एक वैष्णव संत ने उसे “जगन्नाथ नाम” जपने को कहा। माँ चमत्कारिक रूप से ठीक हो गई। सालबेग का हृदय बदल गया। उसने सब कुछ छोड़ दिया और बन गया भगवान जगन्नाथ का भक्त।


एक बार वह रथ यात्रा में आने के लिए रास्ते में था, पर समय पर पुरी नहीं पहुँच सका। उसने रास्ते में ही ईश्वर से प्रार्थना की —


“प्रभु! रुक जाइए... बस एक बार दर्शन दे दीजिए…”

कहते हैं, रथ वहीं रुक गया, जहाँ आज सालबेग की समाधि है।

आज भी हर रथ यात्रा में नंदीघोष रथ सालबेग की समाधि के सामने कुछ क्षण रुकता है — एक मुस्लिम भक्त को ईश्वर का ये सम्मान आज भी जारी है।


यह कहानी हमें सिखाती है कि ईश्वर धर्म नहीं देखते, केवल भाव देखते हैं।



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🌸 2. वृद्ध दंपती की आखिरी यात्रा — मोक्ष के अश्रु


2017 की बात है। आंध्र प्रदेश से एक वृद्ध दंपती रथ यात्रा के लिए पुरी आए थे। वर्षों से एक ही सपना था — “एक बार रथ यात्रा में भाग लेकर भगवान जगन्नाथ का रथ खींचें।” उन्होंने रथ की रस्सी को छुआ, और जैसे ही कुछ कदम चले — पति ज़मीन पर गिर पड़ा — और वहीं उसकी मृत्यु हो गई।


भीड़ में शोर था, पर उस वृद्धा के चेहरे पर शांति थी।

वह बोली —

“मैं जानती थी, उसे मोक्ष की यही अभिलाषा थी। प्रभु ने उसे अपने पास बुला लिया।”


पुरी में लोग इसे “प्राप्ति” कहते हैं — क्योंकि भगवान के रथ के नीचे मरना, यहाँ मृत्यु नहीं, मोक्ष होता है।



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🤲 3. लकवाग्रस्त लड़का — जब हाथ नहीं चले, तो आँखों से खींचा रथ


एक 10 साल का बच्चा, जो बचपन से लकवाग्रस्त था, पुरी रथ यात्रा में आया। वह ज़मीन पर लेटा हुआ बस रथ को देख रहा था। माँ रोती जा रही थी — “मेरे बेटे का जीवन अधूरा है प्रभु… बस एक बार इसे कुछ महसूस करा दो।”

कहते हैं, जैसे ही रथ उसके पास आया — उसका शरीर कांपने लगा।

वो बच्चा चीख पड़ा —


“माँ! रथ चल पड़ा… मैंने खींचा… मैंने खींचा!”


विज्ञान क्या कहेगा? हम नहीं जानते।

पर माँ और बेटे के आँसुओं ने उस दिन लाखों आंखों को भीगा दिया।




🌈 पुरी – जहाँ प्रेम ही सच्चा धर्म है


जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा इसलिए नहीं महान है कि उसमें करोड़ों लोग भाग लेते हैं,

बल्कि इसलिए कि वहाँ ईश्वर हर जाति, धर्म, लिंग और स्थिति को एक समान प्रेम देते हैं।


यहाँ मुस्लिम दरगाह भी उतनी ही पवित्र मानी जाती है जितना मंदिर का गर्भगृह।

यहाँ रथ खींचने वाले के लिए न रक्त देखा जाता है, न कुल।

यहाँ ईश्वर भक्तों के आंसुओं को देख, रथ रोकते हैं।

📜 My-Lekh की ओर से


हमारा उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि उस श्रद्धा और करुणा को शब्दों में उतारना है, जो इन कहानियों में बहती है।

पुरी की रथ यात्रा एक परंपरा नहीं — यह एक आंतरिक यात्रा है, जो हमें जोड़ती है — प्रभु से, अपने आप से, और एक-दूसरे से।

जहाँ ईश्वर खुद सड़कों पर उतरते हैं" — ये श्रृंखला आपको केवल इतिहास नहीं, बल्कि हर उस भावनात्मक धड़कन से जोड़ेगी जो करोड़ों दिलों को पुरी से जोड़ती है।



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👉 अगले भाग में पढ़िए:

"भाग २: नवकलेवर – जब भगवान मरते हैं और पुनर्जन्म लेते हैं"

जहाँ एक रहस्यमयी रात में भगवान की मूर्तियाँ बदलती हैं, और उनके ‘दिल’ का स्थानांतरण होता है…


क्या आपने कभी रथ यात्रा देखी है या पुरी की यात्रा की है?

नीचे कमेंट में अपने अनुभव ज़रूर साझा करें।और अगर यह लेख आपको पसंद आया हो, तो कृपया शेयर करें, क्योंकि ज्ञान और आस्था तभी बढ़ती है जब वह बाँटी जाए।


तैयार हो जाईये, जल्द ही अगला भाग — "नवकलेवर: जब भगवान मरते हैं और पुनर्जन्म लेते हैं" आ रहा है।🛕✨

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