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साँसों का कर्ज़

Jul 30
3 min read

अब तो हर साँस

बस इस बात की गवाही देती है

कि जिस्म अभी ज़िंदा है...

रूह को तो ख़ामोश हुए

एक ज़माना बीत गया।


अहसासों की चिता

कब की जल चुकी है,

और ख़्वाहिशों की राख

अब भी दिल के किसी कोने में

ख़ामोश पड़ी है।


हम जी कहाँ रहे हैं...

बस साँसों का कर्ज़ चुका रहे हैं।


ज़िंदगी अब कोई सफ़र नहीं,

बस एक ऐसी ज़िम्मेदारी है

जिसे निभाने की वजह भी याद नहीं,

मगर छोड़ देने की इजाज़त भी नहीं।


सवाल इतने हैं

कि हर ख़ामोशी

एक चीख़ में बदल जाती है।

और जवाब...


शायद वक़्त की किसी बंद किताब में

हमेशा के लिए दफ़्न हो चुके हैं।


हम तो बस

अँधेरों के अथाह समंदर में

रोशनी की एक बूँद तलाशते हुए

थकते जा रहे हैं...

टूटते जा रहे हैं...

और फिर भी

चलते जा रहे हैं।


न कोई राह अपनी लगती है,

न कोई मंज़िल

हमारा इंतज़ार करती है।


बस वक़्त की बेरहम आँधियों में

अपने ही वजूद के बिखरे हुए टुकड़े समेटते,

हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरते,

और हर सुबह

एक नई मुस्कान का मुखौटा पहनकर

ज़िंदा होने का अभिनय करते जा रहे हैं।




शायद...


ज़िंदगी का सबसे बड़ा दर्द

मर जाना नहीं होता,


बल्कि जीते-जी

अपनी ही रूह से बिछड़ जाना होता है।


"कुछ दर्द चीख़ते नहीं,

बस उम्रभर साँस लेते रहते हैं।"

और

"कुछ लोग जीते नहीं,

बस अपने हिस्से की साँसें पूरी करते हैं।

मुस्कुराते इसलिए हैं,

क्योंकि आँसू अब सवाल नहीं पूछते।"

कभी-कभी सोचती हूँ...

क्या सचमुच साँस लेना ही ज़िंदा होना है?


अगर हाँ, तो फिर इतने लोग चलते-फिरते हुए भी भीतर से इतने ख़ामोश क्यों हैं?

शायद इसलिए कि इंसान की मौत हमेशा धड़कनों के रुकने से नहीं होती, कई बार वह तब मर जाता है जब उसके सपने उससे बिछड़ जाते हैं... जब भरोसा टूट जाता है... जब अपनों के बीच भी वह ख़ुद को अकेला पाता है।

उसके बाद वह जीता नहीं... बस निभाता है।

रिश्ते निभाता है... ज़िम्मेदारियाँ निभाता है... चेहरे पर मुस्कान निभाता है... और सबसे कठिन— हर दिन ख़ुद को निभाता है।




दुनिया कहती है, "समय सब ठीक कर देता है।"

लेकिन समय... हमेशा ठीक नहीं करता।

कभी-कभी वह केवल इतना करता है कि दर्द के साथ जीना सिखा देता है।

उसे अपनी यादों को छेड़ने की हिम्मत भी नहीं होती,

क्योंकि डर है...

कहीं वह राख फिर से

पुराने ज़ख्मों की आग न बन जाए।

शायद इसलिए कि इंसान की सबसे बड़ी थकान

शरीर की नहीं होती...

वह मन की होती है।

जब बार-बार टूटे हुए भरोसे

दिल पर दस्तक देते हैं...

जब अपनों के बीच भी

अपनापन तलाशना पड़े...

जब हर कोशिश के बाद भी

हाथ खाली रह जाएँ...

तब इंसान रोना भी छोड़ देता है।

फिर आँसू नहीं बहते...

वे भीतर ही भीतर

पत्थर बन जाते हैं।

ज़िंदगी तब एक सफ़र नहीं रहती,

एक फ़र्ज़ बन जाती है।

सुबह उठना,मुस्कुराना,

सबसे कहना—"मैं ठीक हूँ"...

और रात को

तकिए में चेहरा छिपाकर

अपने ही सवालों से हार जाना।

सवाल इतने हैं, कि हर ख़ामोशी

एक चीख़ बन जाती है।

और जवाब,

वे शायद वक़्त की किसी बंद किताब में

हमेशा के लिए दफ़्न हो चुके हैं।

हम तो बस, अँधेरों के अथाह समंदर में

रोशनी की एक बूँद तलाशते हुए

थकते जा रहे हैं...

टूटते जा रहे हैं...

और फिर भी चलते जा रहे हैं।

न कोई रास्ता अपना लगता है,

न कोई मंज़िल,

इंतज़ार करती दिखाई देती है।

बस वक़्त की बेरहम आँधियों में

अपने ही वजूद के बिखरे हुए टुकड़े समेटते,

हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरते,

और

फिर अगले दिन

ज़िंदा होने का अभिनय करते जा रहे हैं।

फिर एक दिन आईने में अपना ही चेहरा देखकर अजनबी-सा लगता है।

याद नहीं आता कि आख़िरी बार दिल खोलकर हँसे कब थे।

याद नहीं आता कि आख़िरी बार बिना किसी डर के कोई सपना कब देखा था।

लेकिन...

शायद कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती।

क्योंकि मैंने देखा है—

सबसे लंबी रात भी

सूरज को रोक नहीं पाती।

सूखी धरती भी

एक दिन पहली बारिश की खुशबू से भर उठती है।

टूटी हुई डाल पर भी

कभी न कभी

एक नई कोंपल जन्म लेती है।

शायद इंसान भी ऐसा ही है।

वह जितना बाहर से टूटता है,

उतनी ही गहराई में

जीने की कोई छोटी-सी वजह

चुपचाप जन्म लेती रहती है।

शायद उम्मीद

कभी शोर नहीं करती।

वह बस

थके हुए कंधे पर

धीरे से हाथ रखकर कहती है—

"अभी सफ़र बाकी है..."

और शायद...

एक दिन ऐसा भी आएगा

जब हम साँसों का कर्ज़ नहीं चुकाएँगे,

बल्कि हर साँस को

ईश्वर का उपहार समझकर

जी भरकर जीएँगे।

उस दिन

ज़िंदगी सिर्फ़ गुज़रेगी नहीं...

महकेगी।



सूरज हर दिन उसी विश्वास के साथ उगता है, मानो उसे यक़ीन हो कि अँधेरा हमेशा नहीं रहता।

शायद यही प्रकृति का सबसे सुंदर संदेश है।

कि टूट जाना अंत नहीं, और थक जाना हार नहीं।

शायद एक दिन इन साँसों का यह कर्ज़ भी उतर जाएगा।

और उस दिन हम सिर्फ़ ज़िंदा नहीं होंगे...

हम फिर से जी रहे होंगे।

शायद वही दिन ज़िंदगी का पहला दिन होगा।

















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