श्रीगीतगोविन्दम् : महाकवि श्री जयदेव की अमर कृति, जिसने प्रेम को भक्ति का स्वर दिया ।।
- Anu goel
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भारतीय संस्कृति का वैभव केवल उसके मंदिरों, शास्त्रों और परम्पराओं में ही नहीं, बल्कि उन दिव्य ग्रंथों में भी निहित है जिन्होंने युगों-युगों तक मानव हृदय को प्रेम, भक्ति और सौन्दर्य का मार्ग दिखाया है। ऐसा ही एक अद्वितीय, अनुपम और अमर ग्रंथ है—
महाकवि श्री जयदेव कृत "श्रीगीतगोविन्दम्"।

यह केवल संस्कृत का एक महान काव्य नहीं है, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक चेतना का मधुरतम संगीत है। इसमें श्रीराधा और श्रीकृष्ण के दिव्य प्रेम का ऐसा अलौकिक चित्रण है, जिसमें श्रृंगार केवल भाव नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक बन जाता है।
लगभग आठ शताब्दियों पूर्व रचित यह महाकाव्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने रचना-काल में था। भारत के मंदिरों में इसके पद गूँजते हैं, शास्त्रीय संगीत में इसकी धुनें जीवित हैं, नृत्य की मुद्राओं में इसकी भावधारा प्रवाहित होती है और भक्तों के हृदय में इसकी भक्ति आज भी स्पंदित होती है।
आश्चर्य की बात यह है कि हममें से बहुत-से लोग श्रीराधा और श्रीकृष्ण को जानते हैं, किन्तु उस महाकवि को नहीं जानते जिसने उनके दिव्य प्रेम को शब्दों की अमरता प्रदान की। श्रीजयदेव केवल एक कवि नहीं थे; वे ऐसे भक्त थे जिनकी लेखनी में भक्ति स्वयं संगीत बनकर उतर आई।
यह लेख केवल श्रीगीतगोविन्दम् का परिचय नहीं है। यह उस अमूल्य धरोहर को प्रणाम है जिसने भारतीय साहित्य, संगीत, नृत्य और भक्ति पर अमिट छाप छोड़ी है।
यदि इस लेख को पढ़ने के बाद आपके मन में महाकवि श्री जयदेव के श्रीगीतगोविन्दम् को पढ़ने की जिज्ञासा जागे, तो यही इस प्रयास की सबसे बड़ी सफलता होगी।
महाकवि श्री जयदेव – एक कवि नहीं, एक भक्त
भारतीय संस्कृत साहित्य में अनेक महान कवि हुए, किन्तु कुछ ही ऐसे हुए जिनकी रचनाएँ केवल साहित्य नहीं रहीं, बल्कि आराधना बन गईं। महाकवि श्री जयदेव ऐसे ही विरले कवियों में से एक हैं।
विद्वानों के अनुसार उनका जीवन लगभग 12वीं शताब्दी में माना जाता है। उनके जन्मस्थान को लेकर विभिन्न मत हैं, पर सामान्यतः पश्चिम बंगाल के केंदुली तथा ओडिशा की परम्पराओं में उनका विशेष सम्मान है।
श्री जयदेव केवल संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान नहीं थे। वे श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक थे। उनकी रचना श्रीगीतगोविन्दम् में विद्वता से अधिक भक्ति, अलंकार से अधिक भाव और काव्य से अधिक समर्पण दिखाई देता है।
भारतीय परम्परा में एक अत्यंत प्रसिद्ध कथा मिलती है कि जब श्री जयदेव गीतगोविन्दम् का एक श्लोक लिखने में संकोच कर रहे थे, तब स्वयं श्रीकृष्ण ने आकर उस पंक्ति को पूर्ण किया।
यह कथा इस विश्वास को व्यक्त करती है कि जब भक्ति पूर्ण समर्पण बन जाती है, तब ईश्वर स्वयं भक्त के जीवन का हिस्सा बन जाते हैं।
यही कारण है कि श्री जयदेव को केवल "महाकवि" कहना पर्याप्त नहीं लगता। वे ऐसे भक्त थे जिन्होंने अपने आराध्य के प्रेम को शब्दों में अमर कर दिया।
श्रीगीतगोविन्दम् आज भी क्यों प्रासंगिक है ?
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि लगभग आठ सौ वर्ष पूर्व रचित एक संस्कृत काव्य आज के आधुनिक युग में क्यों पढ़ा जाए?
उत्तर सरल है—क्योंकि मनुष्य बदलता है, समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं; परन्तु प्रेम, करुणा, समर्पण और भक्ति जैसे मानवीय मूल्य कभी पुराने नहीं होते।
आज का युग अभूतपूर्व प्रगति का युग है। विज्ञान, तकनीक और संचार के क्षेत्र में मानव ने अद्भुत उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। किन्तु इसके साथ ही जीवन में तनाव, अकेलापन, प्रतिस्पर्धा और संवेदनहीनता भी बढ़ी है। ऐसे समय में श्रीगीतगोविन्दम् हमें याद दिलाता है कि जीवन का वास्तविक सौन्दर्य केवल उपलब्धियों में नहीं, बल्कि प्रेम और आत्मीयता में भी है।
गीतगोविन्दम् का प्रेम केवल लौकिक प्रेम नहीं है। यह ऐसा प्रेम है जिसमें -
अहंकार नहीं, समर्पण है;
अधिकार नहीं, स्वीकार है; और
स्वार्थ नहीं, आत्मीयता है।
श्रीराधा और श्रीकृष्ण के माध्यम से महाकवि जयदेव हमें बताते हैं कि ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग केवल ज्ञान नहीं, बल्कि प्रेम और भक्ति भी है।
यही कारण है कि गीतगोविन्दम् आज भी लाखों भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
श्रीगीतगोविन्दम् की रचना-संरचना
महाकवि श्री जयदेव ने श्रीगीतगोविन्दम् को अत्यंत सुव्यवस्थित रूप में रचा है।
इस ग्रंथ में कुल—
12 सर्ग (अध्याय)
24 अष्टपदियाँ
तथा अनेक संस्कृत श्लोक सम्मिलित हैं।
"अष्टपदी" का अर्थ है—ऐसा गीत जिसमें आठ पद या आठ चरण हों।
प्रत्येक अष्टपदी केवल काव्य नहीं, बल्कि संगीतात्मक रचना है। यही कारण है कि गीतगोविन्दम् को पढ़ने के साथ-साथ गाया भी जाता है।
इसकी कथा का मूल आधार श्रीराधा और श्रीकृष्ण के प्रेम, विरह, मान, मिलन और पुनर्मिलन के भाव हैं। किन्तु इन भावों के भीतर गहन आध्यात्मिक संकेत भी निहित हैं।
अनेक भक्त और आचार्य श्रीराधा को जीवात्मा तथा श्रीकृष्ण को परमात्मा का प्रतीक मानते हैं। इस दृष्टि से गीतगोविन्दम् आत्मा और परमात्मा के मिलन की यात्रा भी है।
24 अष्टपदियाँ – एक संक्षिप्त परिचय
श्रीगीतगोविन्दम् की चौबीस अष्टपदियाँ इसकी आत्मा हैं।
इन अष्टपदियों में क्रमशः—
श्रीकृष्ण की माधुर्य लीला,
वसन्त ऋतु का सौन्दर्य,
राधा का विरह,
सखी का संदेश,
प्रेम का मान और मनुहार,
तथा अंततः दिव्य मिलन
का अत्यंत मधुर वर्णन मिलता है।
प्रत्येक अष्टपदी अपने आप में एक स्वतंत्र काव्य है, फिर भी सभी मिलकर एक पूर्ण आध्यात्मिक कथा का निर्माण करती हैं।
यही कारण है कि गीतगोविन्दम् को केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि अनुभव किया जाता है।
प्रथम अष्टपदी – "श्रितकमलाकुचमण्डल"
गीतगोविन्दम् की प्रथम अष्टपदी अत्यंत लोकप्रिय है।
इसका प्रारम्भ इन पंक्तियों से होता है—
श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए।
कलितललितवनमाल जय जय देव हरे॥
दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन ए।
मुनिजनमानसहंस जय जय देव हरे ॥
कालियविषधरगंजन जनरंजन ए।
यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे ॥
मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन ए।
सुरकुलकेलिनिदान जय जय देव हरे ॥
अमलकमलदललोचन भवमोचन ए।
त्रिभुवनभवननिधान जय जय देव हरे ॥
जनकसुताकृतभूषण जितदूषण ए।
समरशमितदशकण्ठ जय जय देव हरे ॥
अभिनवजलधरसुन्दर धृतमन्दर ए।
श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय देव हरे ॥
तव चरणे प्रणता वयमिति भावय ए।
कुरु कुशलंव प्रणतेषु जय जय देव हरे ॥
श्रीजयदेवकवेरुदितमिदं कुरुते मृदम् ।
मंगलमंजुलगीतं जय जय देव हरे ॥
इस अष्टपदी में भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य महिमा का वर्णन किया गया है।
कहां जाता है कि जब भी कोई भक्त गीतगोविन्दम गाता है तो भगवान श्रीकृष्ण स्वयं सुनने आते हैं और अपनी उपस्थिति का आभास भी करवाते हैं।
गीत गोविन्दम् से जुड़ी एक भावपूर्ण लोककथा
भक्ति-परंपरा में श्रीगीतगोविन्दम् से जुड़ी अनेक सुंदर कथाएँ सुनने को मिलती हैं। इन कथाओं का उद्देश्य इतिहास बताना नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के मधुर संबंध का अनुभव कराना है।
ऐसी ही एक अत्यंत भावपूर्ण लोककथा प्रचलित है।
कहा जाता है कि एक छोटे से गाँव में एक बालिका रहती थी। वह न तो विदुषी थी, न ही उसे शास्त्रों का विशेष ज्ञान था। पर उसके हृदय में भगवान श्रीकृष्ण के प्रति निष्कपट प्रेम था। वह प्रतिदिन अत्यंत मधुर स्वर में महाकवि श्री जयदेव कृत श्रीगीतगोविन्दम् का गान करती थी।
गाते-गाते वह कभी वन की पगडंडियों पर, कभी झाड़ियों के बीच और कभी एकांत मार्गों पर निकल जाती। उसे इसका आभास भी नहीं था कि उसके मधुर भजन से प्रसन्न होकर स्वयं श्रीकृष्ण उसके पीछे-पीछे चल पड़ते हैं।
उसी समय मंदिर के पुजारियों ने एक विचित्र बात देखी। प्रतिदिन भगवान को नई पोशाक पहनाई जाती, पर अगले दिन उनके वस्त्र कहीं-कहीं से फटे हुए मिलते। सभी आश्चर्य में थे कि ऐसा कैसे हो सकता है।
कथा के अनुसार, जब इस रहस्य का आध्यात्मिक संकेत मिला, तब ज्ञात हुआ कि ठाकुर जी उस बालिका का गीतगोविन्दम् सुनने उसके पीछे-पीछे वन-पथ पर जाते हैं। झाड़ियों और काँटों से गुजरते समय उनके वस्त्र उलझकर फट जाते हैं।
तब उस बालिका से प्रेमपूर्वक कहा गया—
"बेटी, तुम एक ही स्थान पर बैठकर श्रीगीतगोविन्दम् का गान किया करो। तुम्हारे प्रभु तुम्हारा गायन सुनने अवश्य आते हैं। उन्हें वन के काँटों और झाड़ियों में चलने का कष्ट न दो।"

यह कथा हमें एक गहरा संदेश देती है।
भगवान को हमारे ज्ञान, पद या प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। वे केवल निष्कपट प्रेम और सच्चे भाव के भूखे हैं। जब भक्ति निर्मल होती है, तो भक्त को भले ही भगवान दिखाई न दें, पर भक्त की पुकार भगवान तक अवश्य पहुँचती है।
इसी भाव से अनेक भक्त आज भी श्रद्धापूर्वक श्रीगीतगोविन्दम् का गान करते हैं और विश्वास रखते हैं कि जहाँ इसका गान होता है, वहाँ भगवान की कृपा और उपस्थिति अवश्य होती है।
महाकवि जयदेव यहाँ श्रीकृष्ण को केवल वृन्दावन के कान्हा के रूप में नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के पालनकर्ता और भक्तों के रक्षक के रूप में चित्रित करते हैं।
इस अष्टपदी के विभिन्न पदों में श्रीकृष्ण के अनेक रूपों और लीलाओं का स्मरण मिलता है—
कालिय नाग का दमन,
मधु, मुर और नरकासुर का विनाश,
भक्तों की रक्षा,
श्रीरामावतार में रावण-वध का संकेत,
तथा समस्त लोकों के आधार स्वरूप भगवान का वर्णन।
प्रत्येक पद के अंत में बार-बार आने वाला—
"जय जय देव हरे"
भक्ति की ऐसी मधुर ध्वनि है जो पाठक और श्रोता दोनों के हृदय को स्पर्श करती है।
भारतीय संगीत, नृत्य और मंदिर परंपरा में श्रीगीतगोविन्दम् का स्थान
यदि श्रीगीतगोविन्दम् को केवल एक संस्कृत महाकाव्य कहा जाए, तो यह उसके महत्व को सीमित कर देना होगा। यह ग्रंथ भारतीय संस्कृति के अनेक आयामों—साहित्य, संगीत, नृत्य और मंदिर परंपरा—का अद्भुत संगम है।
महाकवि श्री जयदेव ने अपनी अष्टपदियों की रचना केवल पढ़ने के लिए नहीं की, बल्कि उन्हें गाए जाने योग्य बनाया। प्रत्येक पद में ऐसी मधुर लय और भावपूर्ण संरचना है कि आज भी शास्त्रीय संगीत के अनेक गायक इन्हें अत्यंत श्रद्धा से प्रस्तुत करते हैं।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य, विशेषकर ओडिसी, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी और मोहिनीयाट्टम की अनेक प्रस्तुतियाँ श्रीगीतगोविन्दम् की अष्टपदियों पर आधारित हैं। इन नृत्यों में केवल अभिनय नहीं होता, बल्कि राधा-कृष्ण के प्रेम, विरह, मिलन और भक्ति का सजीव अनुभव कराया जाता है।

श्रीजगन्नाथ मंदिर और श्रीगीतगोविन्दम्
ओडिशा के पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर की परंपरा में श्रीगीतगोविन्दम् का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। सदियों से इसकी अष्टपदियाँ मंदिर की सेवा-परंपरा का अंग रही हैं। यह केवल एक काव्य नहीं, बल्कि भगवान की सेवा का माध्यम माना गया है।
यही कारण है कि श्रीगीतगोविन्दम् केवल पुस्तकालयों में सुरक्षित ग्रंथ नहीं है; यह आज भी मंदिरों में गूँजता है, संगीत में जीवित है और भक्तों के हृदयों में स्पंदित होता है।
महाकवि श्री जयदेव की अमर विरासत
समय के साथ अनेक साम्राज्य आए और चले गए। अनेक कवियों की रचनाएँ इतिहास के पन्नों में सीमित हो गईं। परन्तु महाकवि श्री जयदेव की श्रीगीतगोविन्दम् आज भी जीवित है।
ऐसा इसलिए नहीं कि यह केवल उत्कृष्ट साहित्य है, बल्कि इसलिए कि इसकी आत्मा प्रेम और भक्ति है। प्रेम कभी पुराना नहीं होता और भक्ति कभी समाप्त नहीं होती।
आज भी जब कोई भक्त श्रद्धा से "जय जय देव हरे" गाता है, तो ऐसा लगता है मानो आठ शताब्दियों का अंतर मिट गया हो और महाकवि श्री जयदेव की वाणी पुनः जीवंत हो उठी हो।
आज की पीढ़ी को श्रीगीतगोविन्दम् क्यों पढ़ना चाहिए?
आज हम अपने बच्चों को अनेक विषय पढ़ाते हैं—विज्ञान, गणित, तकनीक, भाषाएँ और कौशल। ये सब आवश्यक हैं।
परन्तु एक प्रश्न हमें स्वयं से भी पूछना चाहिए—
क्या हम उन्हें प्रेम, करुणा, विनम्रता और समर्पण भी सिखा रहे हैं?
श्रीगीतगोविन्दम् हमें यही सिखाता है कि मनुष्य का वास्तविक सौन्दर्य उसके ज्ञान से नहीं, उसके हृदय से प्रकट होता है।
यदि नई पीढ़ी राधा-कृष्ण के प्रेम को केवल कथा के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य के रूप में समझे, तो वह अधिक संवेदनशील, अधिक सहृदय और अधिक मानवीय बन सकती है।
उपसंहार
महाकवि श्री जयदेव का श्रीगीतगोविन्दम् केवल संस्कृत साहित्य का गौरव नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है।
यह हमें सिखाता है कि प्रेम केवल एक भावना नहीं, साधना है। भक्ति केवल पूजा नहीं, जीवन का भाव है। और ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग केवल ज्ञान से नहीं, निर्मल हृदय से भी होकर जाता है।

यदि एक दिन कोई बालक पूछे—
"मुझे श्रीगीतगोविन्दम् क्यों पढ़ना चाहिए?"
तो उत्तर केवल इतना होगा—
"यदि तुम प्रेम को समझना चाहते हो, भक्ति को अनुभव करना चाहते हो और श्रीराधा-कृष्ण के दिव्य संबंध की मधुरता को जानना चाहते हो, तो एक बार अवश्य श्रीगीतगोविन्दम् पढ़ो।"
और यदि कोई माँ अपनी संतान से कहे—
"मैं चाहती हूँ कि तुम केवल सफल नहीं, एक अच्छे और नेकदिल इंसान बनो,"
तो श्रीगीतगोविन्दम् उस संकल्प का एक सुंदर साथी बन सकता है।
यदि एक दिन मेरी बेटी मुझसे पूछे कि मैंने उसे सबसे पहले 'गीत गोविन्दम्' क्यों पढ़ाया, तो मेरा उत्तर होगा—
क्योंकि गीता तुम्हें जीवन जीना सिखाती है,
और गीत गोविन्दम् तुम्हें प्रेम करना सिखाता है।
गीता तुम्हें कर्म का मार्ग दिखाती है,
और गीत गोविन्दम् तुम्हारे हृदय में भक्ति का दीप जलाता है।
मैं चाहती हूँ कि तुम केवल सफल नहीं, संवेदनशील बनो।
केवल बुद्धिमान नहीं, करुणामयी बनो।
केवल अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए भी जीना सीखो।
यदि राधा-कृष्ण का प्रेम तुम्हारे हृदय में उतर गया, तो मुझे विश्वास है कि तुम एक अच्छी इंसान अवश्य बनोगी।
और मेरे लिए यही जीवन की सबसे बड़ी सफलता होगी।"

अंत में...
"ज्ञान से हम किसी ग्रंथ को समझते हैं,
लेकिन श्रद्धा से हम उसे जीना सीखते हैं।
शायद इसी कारण श्रीगीतगोविन्दम् आज भी केवल पढ़ा नहीं जाता,
बल्कि गाया, जिया और अनुभव किया जाता है।"
कुछ पुस्तकें पढ़कर समाप्त हो जाती हैं।
पर श्रीगीतगोविन्दम् पढ़ने के बाद एक नई यात्रा आरम्भ होती है—
प्रेम की, भक्ति की और आत्मा की।
यदि इस लेख को पढ़ने के बाद आपके मन में महाकवि श्री जयदेव कृत श्रीगीतगोविन्दम् को पढ़ने की जिज्ञासा जागी हो, तो यही इस लेख का सबसे बड़ा उद्देश्य है।




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